सदुपयोग और द्वन्द
किसी वस्तु से नही उसके दुरुपयोग से हानि है । और उसके सदुपयोग से निश्चित दिव्य हित सम्भव है । वस्तुओं की माँग ना होकर सदुपयोगिता की माँग उठे ।
दिवारात्रि वास्तविकता से अनभिज्ञ हम पापमय हो रहें होते है । स्वयं की स्थिति का चिन्तन कठिन है परंतु अन्य का दोष दर्शन स्पष्ट है । जब तक सघनतम कुकृत्य भी निर्द्वन्द लीला अनुभव न हो दोष भीतर है ही । अपने भीतर के दोष रहने भर तक ही दोष दर्शन की बाहर क्रीड़ा है । स्वयं के निर्द्वन्द स्थिति पर फिर बाह्य द्वन्द का अनुभव नही हो सकता ।
यहीं द्वन्द प्रेम रस में नित्य रसीला कर क्रीडामय है ।
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