तुलसी पूजन या .. युगल तृषित
जब गोपी प्रेम भावित हृदय से अथवा इससे अस्पष्ट भावना से भी कोई भावुक कार्तिक का व्रत परायण , भजन और विशेष नियम आदि तुलसी पूजन सहित करते है तो जो स्पंदन देव उठनी एकादशी तक एकत्र होते है उसमें श्री तुलसी महारानी एक नित्य अनुराग प्राण , हृदय और नयनों में भर ही देती है । उनके उस सौभाग्य महोत्सव पर दीपोत्सव पुनः उच्छलन हो उठता है और सहज सौभाग्य प्राप्त भी हो जाता है । वह पूरा माह नाना प्रकार से कृष्ण प्रीति को आंदोलित करता है एवं तनिक भी अन्य भाव या धर्म का चिंतन ही प्रकट नहीं हो पाता है क्योंकि वातावरण में उत्सवित रागों की झूम रहती है । पदों में वैवाहिक और शीतल कोमल राग के नृत्य गान भरित होते है । जबकि रसिक परम्पराओं में जाड़े की वेला में ऊष्ण सुख और रसार्थ वैसा ही भोग और राग निवेदन होता है , एवं विशेष 25 दिसम्बर के लक्ष्य से हम तुलसी पूजन करते है तो कितना भी चिंतन कीजिए वह कार्तिक माह वाली कृष्ण प्रीति नहीं बनेगी क्योंकि पूरा वर्ष भर नित्य पूजन कोई करते तो तुलसी की स्थितियों को समझते कि कब कितना और कैसे कैसे पूजन किया जा सकता है । जबकि पूरा वर्ष भर नित्य पूजन आदि भूलकर मात्र इस वेला में केवल मात्सर्य भावना से की गई पूजन किन्हीं अन्यों को बताती है कि हममें कितना सनातन तत्व अदृश्य हो चुका है क्योंकि उनकी ही इच्छाओं से तय हुआ व्यापार , इससे उनको मिलता है एवं अन्य के प्रपञ्च को मिटाने के प्रयोग में तुलसी इसमें प्रयुक्त हुई है । तुलसी आदि कोई अस्त्र या शस्त्र नहीं कि मनों में भरे युद्ध में वह व्यय हो । उन दिव्यताओं की अपनी भावना से उनका सँग हो और जिन्होंने भी पूरा जीवन कार्तिक सहित देवउठनी पूजन किया है वह इस तरह के बाह्य व्यवहार में नहीं फंसेंगे । अंग्रेजों ने बहुत सी जड़ी बूटी मिटा ही दी थी , पूरे पर्वत के वन हटाकर अपने प्रयोगों के बाग लगाए थे उनमें से कोई लुप्त वनस्पति की खोज पुनः कोई करें , तो उत्तम हो और कुछ वर्षों में तुलसी के हाई ब्रीड बीज भी विदेशी कंपनी ही बेचेगी क्योंकि ऐसा कौन है जो आज हाई ब्रीड नस्ल का कोई आहार नहीं लेता हो । यह कैसा युद्ध है ... अंग्रेजो सङ्ग उन्हीं अंग्रेजो के ग्राहकों , और इसमें तुलसी पूजन क्यों , क्या वह इतनी निर्बल या दीन या असहाय है , वह ही तो परम् भक्तों की उद्धारिका है , अतः अपने भौतिकी युद्ध में किन्हीं अप्राकृत शक्ति को प्रयोग करने से कतई लाभ नहीं बनेगा क्योंकि यह स्पष्ट होगा कि हम उनके कौतुक चक्र से कितना दूर है । किसी का भी जन्म दिन कभी भी मनाने को आप तैयार है क्या ? अथवा किसी का भी वर्षगांठ आदि परम्पराओं में निहित उत्सव है ... तुलसी विवाह उत्सव , देव उठनी एकादशी पर और जो मनाए हो 25 दिसम्बर को उस दिन कौनसा उत्सव है उनका ... बताइए । केवल वनस्पति या पौधा समझकर पूजा करने से उनका दिव्य अप्राकृत महत्व कैसे स्पष्ट होगा क्योंकि अन्नत मनोरथों सहित दुर्लभ श्रीकृष्ण प्रेम में प्रीति लालसा हेतु तो यह पूजन उत्सव आदि तय ही है । बहुतों को यह लग रहा है कि मेरी ओर से यह मना क्यों ... उन्हें इसमें लाभ दिख रहा है जबकि मना नहीं है अपितु नित्य हो अर्चन और ऋतु अनुरूप एवं इस पूजन में सहज पूजन नहीं है , तुलसी स्वतः इष्ट एवं शास्त्र और सिद्ध एवं रसिक आदियों से सम्मानित दिव्य लता है और उन्हें इस तरह के ढोंग से कोई लाभ नहीं होगा , मनुष्य के स्वार्थ पूरित सङ्ग से किस नदी या दिव्य औषधि आदि का हित हुआ है और जो उनके सेवा क्रम में सँग है वह उनके अवकाश आदि को जानते मानते ही है अतः यहां यह सिद्ध हुआ है कि तुलसी से आपके संवादात्मक स्पंदन ही नहीं है ... क्योंकि उनकी जीवन यात्रा से अपरिचित ऐसा नहीं ही करेंगे , कृष्ण प्रीति शून्य उनका चिंतन उतना हितकर भी कैसे ही होगा और इस प्रकरण में संकल्प ही कुछ अन्य ही विषय हेतु आदि ही है । वैशाखी से ओणम तक सभी कृषि आधारित उत्सव है जो कि कृषक जानते ही है , अतः कब अर्चन होता है वनस्पतियों का ... जब वह इष्ट को सुख देने हेतु सज्जित भी तो हो ... अपनी नव्या दशाओं में ... अपनी सुगंध और पुष्प मंजरी आदि सहित । और कृषकों के ही यह वंशज ... पश्चिमी आहार विहार में ध्वस्त प्राणी ... पश्चिम से ही युद्ध में किस दिव्य माधुरी को अपने अस्त्र शस्त्र में प्रयोग कर रहे है उन्हीं पश्चिम के मनोरथों पर बनाए कालचक्र को मानकर ... और क्या इस लक्ष्य में भीतर कही भी कृष्ण प्रीति लालसा थी , अगर हाँ , तब तो पूरा वार्षिक पूजन या मासिक परायण लालसा से हृदय भीगा होगा । यही माह चाहिए तब भी ... इसका आपको पूरा पौष वैसे ही स्नान आदि करना होगा जैसे कि कार्तिक ... क्या आपने किन्हीं परम्पराओं से सम्पूर्ण पौष स्नान नहीं सुना ... ब्रह्म मुहूर्त में शीतल जल से स्नान और पूजन आदि आदि । ... बहुत सी लताएं बसन्त में सुवासित होगी ही , बसंत में वह पुनः सुन्दर खिलें अतः इस समय उन्हें (तुलसी) तंग करना उचित नहीं , क्योंकि संभवतः आपका भी कोई शयन या आराम का समय होगा ही । सूर्य की स्थिति के कारण इस समय विवाह आदि के मुहूर्त नहीं होते है और सूर्य आदि की स्थितियों से भी हमें असर नहीं होता है तो महाकुंभ या संक्रान्ति का लाभ कैसे होगा ? इस खरमास की वेला में यह दिनांक युक्त वार्षिक उत्सव क्यों , जबकि शास्त्रों के प्रसंग में मकर के सूर्य की प्रतीक्षा के प्रसंग है ... (भीष्म पितामह) ... हे मधुकर ... मधु ऋतु तक अपनी रतियों के रथों को बांध लीजिए ... । बसन्त निकट ही है ... ... अतः , हे सनातनियों आपका सम्पूर्ण लाभ शास्त्र में सहज कथ्य है सो अपनी अपनी बुद्धि प्रयोग नहीं ही हो । युगल तृषित । भीष्म पितामह से भी अर्थ नहीं तो स्मृति रहे कि किसी भी तर्पण में उनके निमित सहज ही हमारे द्वारा वैसा ही तर्पण आदि है जैसा कि निज पूर्वजों के हेतु ।
श्रीहरिदास
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