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कृषि उत्पादों का आयात और भारत

अमेरिका सहित विश्व के कई राष्ट्र भारत में अपने देशों के कृषि उत्पाद (एग्रीकल्चर) का व्यापार करना चाहते है , जिसमें वें आज नहीं तो कल सफल हो ही जाएंगे क्योंकि नागरिकों की अपनी वैश्विक मांग बनेगी जबकि बहुत बड़े पैमाने पर उत्पादन (mass production) हितकर नहीं होते है । इससे राष्ट्र के कृषक वर्ग को भी हानि होगी । अपनी माँ के दूध की तरह ही अपनी धरती का सरलता से प्रकट किया अन्न भी महत्वपूर्ण है , भारत को ग्राहक या बाजार मानते हुए स्वार्थी राष्ट्रों के वह उत्पाद हमारी प्राकृतिक पूजन में श्रीदेवी और भूदेवी के अर्चन में बाधक होंगे अर्थात् दीर्घकालीन हानिप्रद होंगे ।  ऑर्गेनिक या एग्रीकल्चर उत्पाद का अद्भुत सँग जब बनता है जब वें उत्पाद छोटे और अछूते देशी खेतों से जुटाना सिखाया जावे जबकि नव पीढ़ी विदेशी राष्ट्रों के नामोच्चारण से ही वशीभूत हुई सी वहां के कृषि उत्पादों का सँग करेंगी जबकि वह दमनात्मक और फसलों के जैविक प्रारूप को बदल कर की गई कारोबारी खेती होगी । हमारे यहाँ खेती एक प्रकार का यजन या पूजन या अनुष्ठान ही था ।