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मनुष्यता का सदुपयोग , तृषित

मनुष्यता का सदुपयोग मनुष्य रूपी जीव जब तक मानवता को प्राप्त नही कर सकता जब तक वह स्व हित से उठ सेवा भाव से पर हेतु हृदय से तत्पर हो । मनुष्य नव नव सृजन करता और प्रकृति और ईश्वर ...

मनहर का चुराया मन , तृषित

*मनहर का चुराया मन* सर्वस्व छुट जाता उन मनोहर की एक झाँकी से , शेष रहती एक आस ... दर्शन व्याकुलता से भरे नेत्रों की प्यास बन । एक बार , एक झाँकी हो जाती तो सब सहज होता । फिर बाहरी पीड़ा , ...

उत्कट लालसा , तृषित

भगवत् दर्शन की उत्कट लालसा ऐसी हो जो सर्व विस्मृत कर दे । स्वरूप विस्मरण हो जावें जो कि असहज होता , विस्मरण की अवस्थाओं में भी किञ्चित् स्मरण रह जाता । सम्पूर्णता का त्याग क...

विदेह सहज नही , तृषित

तुमने वह पंछी देखा पर वह है नही । वह वृक्ष देखते हो वह भी है नहीँ । यह नभ स्वयं नहीँ है यह सब विदेह है देह भर दृश्य । स्वयं कही परे । पर विदेह सहज कभी नहीँ है । तुम में तुम न रहो तुम...

विदेह जीवन कविता , तृषित

विदेह ना ऐसा ना करना कभी ना करना देखो मृत कर देना विदेह जीवन मत देना क्योंकि अब हर पल तुम बिन जैसे मुझे कर जाती है रिक्त मन खोजता है हर वन उपवन कहाँ गए फिर मेरे जीवन धन तुम बिन ...

विदेह सहज नही , तृषित

तुमने वह पंछी देखा पर वह है नही । वह वृक्ष देखते हो वह भी है नहीँ । यह नभ स्वयं नहीँ है यह सब विदेह है देह भर दृश्य । स्वयं कही परे । पर विदेह सहज कभी नहीँ है । तुम में तुम न रहो तुम...

गोपी हृदय में प्रेम समुद्र

गोपी हृदय में प्रेम समुद्र वास्तव में ये गोपरमणियाँ प्रेम-जगत् की तो परम आदर्श हैं ही, नारी-जगत में भी इनकी कही तुलना नहीं है। विश्व तो क्या, भगवत-राज्य में भी किसी भी नारी के ...