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कल्पनातीत कृपा , भजन... तृषित

*भजन भी जो देता है वह किसी के भी लक्ष्य से अति उच्चतम  होता है* , अर्थात भजन कागज की नाव चाहने वाले को मणियों की नाव में बैठाने का सामर्थ्य रखता है , लक्ष्य रखिये... परन्तु जो आप पाव...

Pdf पुस्तकें भक्ति - धार्मिक

https://drive.google.com/folderview?id=16gGuh6u8txHpT6xCro0cbvnTu5jWvEe2 https://drive.google.com/folderview?id=15AJnC6boZZdNp22LUBms7h5ql3KqvyvN https://drive.google.com/folderview?id=1weaB8fHbWIIp4kznp7hb_oJQ8l0uxp7M

अप्राकृत स्थिति , तृषित

कोई भी स्थिति जब तक अप्राकृत ना हो जावें वह अधुरी है । भले रूदन हो , या साधन हो , या कर्म ही हो । प्राकृत और स्वयं को देह में बद्ध मान अनुभवित सभी स्थितियाँ पूर्ण प्रकाश नही कर पा...

व्याकुलता पी जाओ , तृषित

कुछ मानना ही है तो स्वयं को उनकी वस्तु मान लो । (श्रीयुगल की) उन्हें परस्पर निकट निहारो अत्यंतम निकट इस भाव से उनकी निकटता की भावना को प्रबल करते करते आपको उनका प्रेम रस अनुभ...

मनुष्यता का सदुपयोग , तृषित

मनुष्यता का सदुपयोग मनुष्य रूपी जीव जब तक मानवता को प्राप्त नही कर सकता जब तक वह स्व हित से उठ सेवा भाव से पर हेतु हृदय से तत्पर हो । मनुष्य नव नव सृजन करता और प्रकृति और ईश्वर ...

गोपी भाव की वास्तविक गति , तृषित

जीव के लिये भोग विषय से छुट कर अति दुर्लभतम प्रेम रस में भरित गोपी भाव जिसमें वह प्रियतम सँग रागात्मक है ...जहाँ प्रियतम से सघन निजता है । मादनख्या भाव है जहाँ । किन्हीं को प्र...

श्रीयुगल की द्विधा वृत्ति , तृषित

*श्रीयुगल की द्विधा वृत्ति* प्रेम में जीवन एक है , परन्तु किसी भी खेल को दो पाले चाहिये , प्रेम से होती एकता में खेल के लिये द्विधा स्थिति कैसे ??? युगल का मन एक है , हृदय एक है , रस भाव ...