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अनन्य सुख (संक्षिप्त) , तृषित

*अनन्य सुख* (संक्षिप्त) अनन्यता हृदय की गोप्य सेवा निधि है अपने प्रेम के लिए प्राप्त आचार्य कृपा प्रसादी । वह निभृत सुख सेवा है । सो कुँज निकुँज स्थितियां भी अनन्यता की लालस...

श्रृंगार रस (प्रस्तावना) , युगल तृषित

*श्रृंगार रस* (प्रस्तावना) प्रेमी के अतिरिक्त यह रस किन्हीं के लिये भी सुलभ नहीं अथवा अप्रेमी विज्ञानी जन चन्द्र चकोर या घन-मोर या जल मीन आदि वृतान्तों पर केवल हास्यास्पद ह...

रूचि , तृषित

*रूचि* सिद्ध ज्ञान स्वयं को ब्रह्म से अभिन्न करने का प्रयास ही है और वहाँ सर्व स्थिति - भावना आदि में सहज स्वीकार्यता होनी ही चाहिये अर्थात् आते हुए बाणों को नमन और जाते हुए प...

मेरी स्वामिनी श्रीराधिके 6

इसे विस्तार से सुनकर ही समझा जा सकेगा , यहाँ सांकेतिक भाषा है *हे सम्पूर्णने   - कोटि-कोटि ब्रह्मांडो के अखिल स्वामी पद को त्यागे हुए श्रीप्रियतम को भी रसप्रेम की सम्पूर्ण म...