25 - 12 कर्णामृत बिन्दु , तृषित

*श्रीकृष्ण माधुरी को कर्णामृतवत पीना महाभाव स्वरूपा श्रीप्रिया जू की श्रृंगार माधुरी की सेवा में होना है*

*श्रीश्यामसुन्दर स्वयं ही माधुर्य की अनवरत सेवाओं से भरे मधुर मधुर विलास कीर्तनों के नादित  झरने बरसा रहे है वेणु से*

*श्यामसुंदर चित्ताकर्षक मुग्ध कर खींच लेने वाली मधुरताओं के भण्डारी है*

*श्रीश्यामसुन्दर के मयूरपंख आदि श्रृंगारों में प्रीति भरित कोमल सरस आह्लादों से झँकृतियाँ उमड़ घुमड़ रही है*

*झूमता मयूर पंख जैसे झूमते हृदय की अन्तर्मधुता को प्रकट कर रहा हो*

*नृत्य भरित मयूर पंख आदि श्रृंगार  सरस् रीतियों से खींचने के लिये नए नए कौतुकों से श्रीकृष्ण रूप मधुरता के सरोवर में धकेल रहा हो*

*श्रीप्रियतम श्यामसुंदर कैंकर्य तृषित है*

*श्रीप्रियतम श्यामसुन्दर श्रृंगार तृषित है*

*श्रीप्रियतम श्यामसुन्दर निकुँज विलास केलि तृषित है*

*श्रीप्रियतम माधुर्य केंद्र में पराग है और श्रीराधारानी मकरन्द*

*श्रीप्रियतम भावकीर्तन के वशीभूत रसमय विकसित होते रससुधाकर मधुकर वपु है*

*श्रीकृष्ण माधुरी में अभिषेक हुए हृदय पर वह निज आह्लादिनी सँग प्रकट होते है अर्थात भाव झारी में भरित रस वत*

*ललित अरुण हिय संस्पर्श से नील वपु में कहीं कहीं कुंकुम आदि आभा छिटक रही है जो कि राधा रानी के स्वरूप में सेवित कर्पूर , अगरु , कस्तूरी आदि के संस्पर्श से सुसज्जित है (विलासश्रृंगार लेपित)*

*प्रियतम श्रीराधारमण का हृदय व्यक्त-अव्यक्त विलासों का समुद्र है जो वेणु से झर रहा है*

*श्रीप्रियतम श्यामसुन्दर मधुर सुकुमार स्वरूप से परम् उल्लासों की शीतल लहरें छूट रही है जो बताती है कि वें उत्स पीते हुए उत्स पीने को आकुलित है*

*श्रीप्रियतम मनोहर अत्यन्त शोभा से भरे सुंदरतम प्राण है , जो केवल प्राण ही नही है प्राण में खिलती बहुत सी रसिली भावनाओं की लताओं पर फूलों की गुच्छे की भाँति बढ़ रहे है अर्थात मधु और मधु होती प्राणनिधि*

*श्रीप्रियतम अपने हावभाव और श्रृंगारों से अपने हृदय में भरी प्रीति का समुद्र उड़ेलने के संकेत करते हुए , आगन्तुक को नृत्यमय होने की लालसाओं से भर देते है*

*श्रीप्रियतम श्रीराधारानी के एकमात्र प्रियतम इसलिए है क्योंकि वह केवल सर्वगुणसम्पन्न नहीं है , अपितु वह उन गुणों से निज प्राणप्रिया की सेवा चाहने से मधुतम मधु श्रृंगारों-गुणों के एकमात्र धनी है*

*श्रीप्रियतम सेवा भावों की ओर मंजुल (कोमल) दृष्टि रखते हुए , स्वयं ही उन भावलता को अंकुरित करते है और सेवामय होकर वनमाली रहते हुए सिंचन आदि करते है और खिली हुई लता को महाभाव रूपी मधुर कोमल स्थिति देकर रसमय सँग से प्रकट भावपुष्पो स्वयं ही चुन कर मालिकाएँ गूँथ कर उन भाव बिन्दुओ को प्रेम श्रृंगार की कुँजो में सजाना चाहते है*

*अधर - मधुर हिय उल्लास से अधर अरुण वर्ण के , मुस्कान की चमक से शुभ्र (धवल चमकते), राधारानी और रमणियों के नयन चुम्बन से लगे काजल से श्यामल ।*
*अरुण , शुभ्र , श्यामल अधर*

*हियअनुरागभीगे ललित चरण - महाभाव प्रेमी गोपांगनाओं के हृदय के अनुराग में भीग कर श्रीश्यामसुन्दर के चरण-कमल फुल्लपाटल की भाँति शोभमय है (दूध में आलता घोलने की भाँति श्वेतरक्त रँग के चरण)*

*श्रीकृष्ण माधुरी कीर्तन में प्रकट स्वरूप सौंदर्य से ललित लीलाओं  का उत्सवित सँग भरा है*

*कर - अरुण करपल्लव पद्म की तरह सुगन्धों और शीतल लहरों से भीगे  रमणियों को मधुरता-शीतलता से आकुलित करते हुए झूम रहे है*

युगल तृषित

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