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Ek athah pyasa ... अथाह प्यासा

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सागर भी है . प्यास भी है प्यासा भी है . उफ और आह दोनों ही है ... कमी है तो मिलन की कोशिश है तो छुने की हद है यूं सताने की कब आओगें आप ना जाने ... बस आ ही जाना लोग तुम्हें बेवफ़ा कहें उससे पहले आ जाना ना पाने का दर्द कम नहीं तेरे बेवफ़ा होने पर तो जन्म - जन्म मरा ही हो जाऊगाँ ... आस है मेरी निभाना तुम्हें है प्यास है मेरी , पिलाना तुम्हें है एक तेरी ऊँचाई एक औक़ात मेरी फुंक में उड जाऊं कितनी क्षमता मेरी ... बिंदु को सिंधु की तलाश एक चकोर को याद चाँद की आई उफ ! अपनी ही सांसों ने दूरी बढाई ... मेरी एक ही तमन्ना ने मुसिबत मेरे हुज़ुर आपकी बढाई ... कुछ भी हो ... नहीं मैं लायक कि निगह भी डाल दो पर आजाओ साँवरें दूजी आस ही ना लगाई ... तेरी असीमता की कल्पना मुझे सुखा कर और छोटा कर रही है ... प्यासा ही फना होना था तो कुद़रत ने जरुरत ही युं मेरे होने की क्युं उठाई ... एक अथाह प्यासा ... सत्यजीत !!

कृष्ण तेरी यादों में ... krishna hi krishna

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अब मेरी गली की ओर ... जहाँ कुछ ना बन पा रहा हो  जहाँ कोई इतना सुन्दर  इतना कोमल हो कि देखते  भी ना बने ...  जिसकी कान्ति की कल्पना  मात्र नेत्रों को चकाचौंध कर  भीगों दें ...  जिसकी कृपा  हेतु ब्रह्मा जी को तप करना पडें | जो अह्लादित कर नटराज को झुमा दें | जो  परम् होकर केवल भक्तजन सुखाय भाव से  झुला झुलें | सब को तृप्त करने वाले वो अकल्पनिय  अथाह सागर से हरिदास जी  को कहें पेट दर्द है ... और सहसा दास जी आंवलें की चटनी चटाने लगे ... जिसकी प्रथम प्रिया बन  यमुना झुम उठी ... कालिन्दी के वर्ण को अंगीकार करने वाले ... जिसके हाथ  की मुरली विचारें .... कही कृष्ण के ना छुने जैसे सुकोमल होंठों  को छुने से पहले ही मैं बजना शुरु कर दूँ तो उचित रहे ...कहीं उन्हें कष्ट ना हो  ... जिनका नाम - सेवा योग्य  होने की कल्पना ही आनन्दित करदें ... वें भक्तहृदय वासी ... व्यक्त होकर पूर्ण  अव्यक्त हेतु .... मनमोहन भगवान होकर कोमल कर उठा आलिंगन को बुलाते प्रीतम हेतु ।  गोपाल हेतु ! कृष्णा तेरी यादों में मैं कुछ पागल ...

कृष्ण कहाँ हो आप ??

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सांवरी सूरत मोहिनी मूरत के, कितने रूप दिखा गया कृष्णा। कभी प्रेमी कभी सारथी बन, गुरु का धर्म निभा गया कृष्णा॥ विराट रूप दिखाकर ब्रह्माण्ड के, हर लोक में छा गया कृष्णा। छोटा ...

संदेह और अहंकार

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स्वाभाविक सत्य है ... सन्देह और अहंकार का होना | जहाँ देखिये वहाँ ... संदेह - संदेह हर किसी को है | हर किसी से ... परमात्मा के होने पर भी | भीतर - बाहर , विग्रह में होने पर तक | संदेह इतना आम है ...

Subhashitani 1 सुभाषितानि १

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Satyajeet Bhawan: सुभाषितानि 1 अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च | पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् || If a fire, a loan, or an enemy continues to exist even to a small extent, it will grow again and again; so do not let any one of it continue to exist even to a small extent. यदि कोई आग, एक ऋण, या एक शत्रु अस्तित्व ही रहेगी क...

पाखंड और अध्यात्म

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पाखंड जब जब पिटा है | लोगों ने अध्यात्म को बिमार माना है | स्वयं को जानना और सार्वभौमिक परमात्मा का सचेत दर्शन करना ... आत्मा और शरीर के भेद को समझकर बौद्धिक स्तर से उठ जाना ... ... मार...