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लेन-देन 1 । तृषित

लेन-देन ईश्वर के जगत रूपी स्वरूप को जीव दे सकता है(सेवा) । जगत के ईश्वर स्वरूप (जगदीश्वर) से जीव केवल ले सकता है (प्रीतिरस)। अर्थात् जब जगत से लिया जाता है तब वह दाता ही है ... जगदीश्...

अप्राकृत वृन्दावन । तृषित

बुकिंग करा कर वृन्दावन आना श्रीवृन्दावन को प्राकृत समझना है । जिन्हें नित्य रस में डूबना वह कुछ सुविधाओं का जोखिम उठाकर धाम आश्रय चाह्वे । कृपा को अवसर दें खेलने का । (जब क...

दुत्कार और दीनता । तृषित

दीन के प्रति दुत्कार और दीनता का दिखावा सँग नही हो सकते । दुत्कार सहना ही दीनता है । दीनता का वास्तविक याचक दीन-हीन के प्रति आदर से भरा होता है अर्थात् जो सहज दीन है वह वरिष्ठ ...

लोकेष्णा और युगल रस । तृषित

केवल युगल रस होने से केवल युगल सँग ही होगा । लोकेष्णाओं से लोक संग्रह होते है । अगर भीतर प्रीति या युगल सेवा भरकर ही वृन्दावन वास मिलता तो वृन्दावन में अंगुली से गिन लिये जा...

दम्भ - तृषित

किसी भी प्रकार का भक्ति का स्वांग (दम्भ) अभिनय होने से बेहतर है प्रपंच में मिले अभिनय को ही भलीभांति निभा लिया जावें । भगवत पथ पर अभिनय होना और बाह्य प्रपंच में प्राणों को आह...

रसिक रीति और स्वार्थ रीति तृषित

प्यारीप्यारे के प्रेम की सेवा । प्यारीप्यारे के प्रेम का ख्याल ही रसिक रीति में है । तुम लालन संग मुदित विराजो मोहे तो करो श्रीयुगल चरणन की चकोरी । प्रेमी वही है जो प्रेमास्पद के प्रेम की सेवा में हो । सो ही ...रसिकन कृपा बिनुं रंच ना उपजे प्रेम  ! शेष अपनी चाल में स्वार्थ भरी चालाकी रहती है । रसिक रस रीति और जीव की अपनी रीति में यह भेद है कि जीव की रीति में उसका अपना सुख है और रसिक रस रीति में रसिक श्रीयुगल श्यामाश्याम जू का सुख ही सेवामय है । श्रीयुगल की अति दिव्य सुखविलास भावना रसिक रीति है ।  जीव रस रीति से हटकर जब केवल अपनी तृप्ति हेतु चलता है , उन्हें अपना आनन्द या सुख या विरह आदि से पोषण बनता जाता है ।  एक दशा है जिसे सुगन्ध आई और मूर्छा बन गई और एक है जो उनसे उनकी सुगन्ध होकर उनके लिए बह रही दशा हो और किसी सुगन्ध को अपनी सुगन्ध नहीं अपितु भिन्न सुगन्ध स्फूर्त होगी ।  एक दशा है कि सुरस मधुर झाँकी बनी और अश्रु बह पड़े ... हृदय गदगद हो उठा ... और यह अपनी दशा भाने लगी फिर इसके हेतु दर्शन बनने लगा कि तुम खड़े रहो और मुझे तरल सरस बने रहने दो ।  रसिक रीतियों में ...

सहजता-चतुरता तृषित

जिनकी भीतरी गति लोक संग्रह में है वह चतुर होने में है पर यह प्रपंच का संग्रह केवल मूर्खता है । चतुरता भी वह ही सच्ची है जो प्रेमास्पद को रिझा सकें । जैसे नागरता की रासि किशोर...