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अन्य स्वरूप की उपेक्षा न हो

युगल चरण रति होना , दिव्य स्थिति है , परन्तु कभी अन्य भगवत् स्वरूप की उपेक्षा ज्ञात अज्ञात भी ना हो । पूर्व में यह कह कर की कृष्ण से भिन्न कुछ नहीँ फिर यह मानना की किसी दर्शन में...

सत्य का दर्शन सहज तृषित

पक्ष-विपक्ष , राग-द्वेष , रहित होने पर निष्पक्ष और निष्काम दृष्टि से सत्य स्पष्ट दिखाई देता है । सत्य का यह दर्शन आगे भगवत् रस में परिणत हो जाता है - सत्य परम् धीमहि , सत्य का अनु...

मेरा आकलन ना करे

[3/6, 00:48] सत्यजीत तृषित: मेरे आकलन से बहुत लोग अपना समय नष्ट कर देते है। लगता है , या तो सब बनावट है । जी बनावट तो है , वरन् साहस सम्भव नहीँ । कहने का । हाँ गोपनीय से गोपनीय बात की जा सकती ...

कथा पॉइंट्स

1 अनुभूति भगवत् कृपा है , प्रसाद है । अभिव्यक्ति रस को पीने का तरीका । चूँकि भगवान वहीँ है , नाम वहीँ अतः एक स्वरूप के दर्शन से अनुभूति एक की होने पर भी अभिव्क्तियां भिन्न होती ह...

कथा भाव

[3/1, 13:00] सत्यजीत तृषित: केवल राधा ही पूर्ण कृष्ण को अनुभूत् और दर्शन कर सकती है । और कृष्ण ही पूर्ण राधा को अनुभूत् कर सकते है , कह नहीँ सकते , अनुभूत् कर सकते है , और परस्पर वह जितना एक ...

मेरी बाईं साँ

देखने भर में वह एक साधारण सी भी नहीँ लगती , परन्तु सजीव चमत्कार को मान लेने का साहस कौन करें ,कलयुग में यह सनातन सी आभा , सम्भवतः अप्सराएं भी गौण हो । गुण की बात ही क्या करना यह तो ...

सुमिरन कर ले मेरे मना

सुमिरन कर ले मेरे मना । तेरी बिती जाति उम्र, हरिनाम बिना ।। कूप नीर विन, धेनु छीर बिन, धरती मेह बिना । जैसे तरुवर फल बिन हीना, तैसे प्रानी हरिनाम बिना ।। देह नैन बिन, रैन चंद बिन, म...