*प्रीतम का झुंझुना (खिलौना)* खिलौना कितना ही छोटा हो उसमें भोक्ता को देने के लिये रस है | मेरे प्रियतम् क्रीड़ाविलासी लीलाविलासी है सो प्रथम खिलौना *झुन्झुणा* जीवन एकरंग मंच है ! और हमें अभिनय करना है ! देह केवल अभिनय हेतु है ! और इस अभिनय को इस तरह करना है कि महादर्शक को हर्ष मिलें , रस मिलें ! भक्त और परम् ज्ञानी केे लिये ईश्वर का लोप होता ही नहीं ! जगत् को ईश्वरिय-प्रकाश या विभूति मान लेने जीवन लीला में ही होगा ! नित्य लीला ! प्रत्येक क्रिया को समर्पण भाव से करना हो तब करना धीरे-धीरे होना होगा और होना खेल होगा ! करने में रसानुभव नहीं है और लीला क्रीड़ावत है परन्तु व्यवहार में खेल का स्वरूप भी स्वार्थ वृति से विकृत हो गया है । खेल का सहज अनुभव नन्हें शिशु और खग-मृग-वानर आदि में मिल सकता है । करने का होना वही होगा जहाँ विलस रहा हो भगवत् सुख की सेवादारी और वह सेवादार सम्बोधित है गोस्वामी (श्रीप्रियतम इंद्रिय सुखों के सेवक) । पूर्ण रूपेण प्रेमास्पद श्रीप्रियतम सुख रस के भाव से प्रति क्रिया कर्म जब सहज भाव से रहे ! प्राप्त दृश्य में हिय भावित दृश्य देखते हुये , मूल म...