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पिंजरे की चुहिया , तृषित

*पिंजरे की चुहिया* परेशान थे हम घरेलू चुहियाओं से उनके कुतरने की हद इतनी थी बिन कुतरा खोजना मुश्किल था सब सामान अब उनका था कितना ही छुपाया फिर भी कुतरा था गलती से कोई किताब व...

यह हवा में जो तेरी खुशबूं , तृषित

यह हवा में जो तेरी खुशबूं है मुझे कहाँ उड़ा देती है पँखो को पकड़ उड़ना आसां नही हैं किससे कहूँ इन पँखों की और मेरी पहचान नहि हैं कुछ मुलायम अहसास सा यूँ छूता है उड़ती कही के लिये ...

समीपता में रस भोग न हो तो एकता हो , तृषित

एक मंजिल की कुछ पगडंडियाँ हो गई हो तो सबको लगता सही पर वह चल रहा है । शेष गलत । सब विधि , सब सूत्र पँहुचते है । प्यारे जु तक जाने की कोई विधि हो उन्हें तो स्वागत करना । सच तो यह है क...

उनकी सरलता बहुत आंदोलित करती है , तृषित

मुझे एक बात बार बार आंदोलित करती । बहुत ... कभी हृदय मुरझाया हो और यह बात स्मरण हो आवे तो कमलवत स्पंदन से हृदय बिछ जाता लाडली लाल के लिये । बहुत छोटी सी बात है यह , परंतु मेरे लिये य...

मुझ विष्ट कीट को उनका आश्रय , तृषित

मुझे पता है मेरी विष्टा कीट तक की गति से भी निकाल अपने नेह की समीर से आंतरिक पावक से विशुद्ध करने में मेरे प्राण समर्थ है । बात उनकी समर्थता की नहीँ मेरी असमर्थता की है । मेरे ...

थाम लो प्रियवर , तृषित

*थाम लो प्रियवर* एक धागा है , जो बाँध देता है मन और प्राणों को प्रिय वस्तु में । प्रेम की अवस्था को निवृत्ति (बन्धन मुक्ति) कहा जाता परन्तु भोग से प्राकृत प्रवृत्ति  होती । जो प...

प्रीतम का झुंझुना (खिलौना) , तृषित

*प्रीतम का झुंझुना (खिलौना)* खिलौना कितना ही छोटा हो उसमें भोक्ता को देने के लिये रस है | मेरे प्रियतम् क्रीड़ाविलासी लीलाविलासी है सो प्रथम खिलौना *झुन्झुणा*  जीवन एकरंग मंच है ! और हमें अभिनय करना है ! देह केवल अभिनय हेतु है ! और इस अभिनय को इस तरह करना है कि महादर्शक को हर्ष मिलें , रस मिलें !  भक्त और परम् ज्ञानी केे लिये ईश्वर का लोप होता ही नहीं ! जगत् को ईश्वरिय-प्रकाश या विभूति मान लेने जीवन लीला में ही होगा ! नित्य लीला ! प्रत्येक क्रिया को समर्पण भाव से करना हो तब करना धीरे-धीरे होना होगा और होना खेल होगा ! करने में रसानुभव नहीं है और लीला क्रीड़ावत है परन्तु व्यवहार में खेल का स्वरूप भी स्वार्थ वृति से विकृत हो गया है । खेल का सहज अनुभव नन्हें शिशु और खग-मृग-वानर आदि में मिल सकता है । करने का होना वही होगा जहाँ विलस रहा हो भगवत् सुख की सेवादारी और वह सेवादार सम्बोधित है गोस्वामी (श्रीप्रियतम इंद्रिय सुखों के सेवक) ।  पूर्ण रूपेण प्रेमास्पद श्रीप्रियतम सुख रस के भाव से प्रति क्रिया कर्म जब सहज भाव से रहे ! प्राप्त दृश्य में हिय भावित दृश्य देखते हुये  , मूल म...