ऐसे रहैं संसार में,हरि ही सौं करि प्रीति , तृषित
*श्रीकुंजबिहारी श्रीहरिदास* *ऐसे रहैं संसार में,हरि ही सौं करि प्रीति* श्रीहरिदास , केवल और केवल जब प्रीति मात्र एक ही दिशा में होती है तो सहज ही अपना नवीन जीवन बना सकती है । इस अखिल ब्रह्माण्ड में सम्पूर्णताओं को अपना प्रभाव दिखाने में हम , हमारे भीतर के प्रीति स्पंदन को छू नहीं पाते है । हम विश्व विजय चाहते है जबकि इस विश्व और इसके विजयी की स्थिर सत्ता ही नहीं । ना ही यह जगत कभी किसी की मुष्टि में बन्द हो सका है तब भी हमारी वृत्तियों पर जगत का सँग प्रभावित दृश्य ही है , विश्व जहां प्रेम करें वहीं हमें प्रेम होता है और विश्व जिसे बिसार दे उसे ही हम स्वयं के लिए त्याज्य मानते है अर्थात् हमारी स्वयं की धारणा मात्र वैश्विक स्थिति है । जबकि सिद्ध रसिकों द्वारा संसार में रहकर संसार बिसारने को कहा गया है , अगर ऐसा हो रहा है तो निश्चित हमें वह रस और वह प्रेम और वह रसायन मिल ही गया है जिससे संसार अछूता ही है और अगर हमें भी वहीं सब अनुभव मिल रहा है जो कि शेष संसार को तो निश्चित ही हमारी दिशा संसार की ओर ही है । संसार के नयन और संसार के संकल्प-विकल्प आदि- आदि इस प्रेम मार्ग पर सार्थक...