जय हो नाम महाराज जी अपनी कृपा बनाये रखना एक सवाल आ गया जेहन में मैं कभी कभी वयस्तता मैं नाम महाराज का संग नही कर पाती अपराध बन जाता हैं। कोई राह दे न ऐसा होने पर आप दर्शन करे उन...
क्या एक बार रसमय होकर पुनः कोई निरस हो सकता है प्रथम गहन रस दर्शन इसलिये होता है कि यथार्थ व्याकुलता तो हो । एक बार रस की चटक लगेगी तभी तो सच्ची व्याकुलता होगी । यह रस प्रकट हो...
कान्हा पुकारते ही सुनते ही भीतर रस उतरा । हृदय में भाव होते ही भाव रूपी दृविभूत तरल मधुरता बह कर पुष्प वत भीतर विकसित होती है । तो रस का भीतर नाम आदि द्वारा प्रवेश कृपा यानि भ...
पार्ट 2 क्या एक बार रसमय होकर पुनः कोई निरस हो सकता है ? कदापी नही हो सकता । जिसे पारस छू गया वह सोना हो गया । अब कोई विज्ञान ही उसे इस ज्ञान से निकाल ले जा सकता है । ज्ञान - मैं अब स्...
हम सब पथिकों के जीवन मे बहुत प्रलोभन होते ही है परन्तु आंतरिक रूप प्राणवत प्राणेश प्रियतम ही आधार विषय हो भीतर की श्रीप्रीति स्वामिनी श्रीप्रिया के .... अर्थात भक्ति महारान...
प्रीति-प्रियतम उन्हें ऐसे सौन्दर्य लावण्य माधुर्य की पिपासा जिसकी स्मृति से ही उनके ही दिव्य देह चराचर जगत प्रेमासक्त हो उनके प्रति आकर्षित होता है । जो खेंचता है वह कृष...
किशोरी जु के भीतर श्यामसुंदर सुख की अथाह इच्छा ही व्याप्त है जिससे उन्हें कभी तृप्ति मिलती ही नहीँ । श्यामसुंदर का कोई भोग्य सुख होता तो कभी तृप्ति सम्भव थी । परन्तु श्याम ...