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बेचारा जगत , तृषित

सारी सरकारी योजनाएं जो निर्धन हेतु होती उसका लाभ कौन उठाता सम्पन्न । क्यों ??? यह सम्पूर्ण दृश्य प्रपञ्च बेचारा है । बेचारा अर्थात वो पशु जिसके पास चारा नहीं ... ... ! अब यह तो लौकिक ...

सुरभित सँगम , तृषित

सुरभित सँगम रसिको का मिलन ...जैसे अनन्त सुगन्धिनियाँ भर गई हो भीतर । रस समागम ... रसिक समागम जहाँ प्राण से प्राण रस एक हो जाता है । एक-एक वह पुतली जो पुकार-पुकार निरखती प्राणप्या...

रसिक बिना कोऊँ समझी सके न , तृषित

रसिक बिना कोऊँ समझी सके न फूल की वार्ता फूल जानते है । अन्य के लिये वह बस हरक़तें भर होती । शिशु के उन्माद को समझने हेतु भी शिशु होना होता है । ऐसे ही प्रेम के विस्मरण रति उन्मा...

कनकता , तृषित

गौरांगी उज्जवले प्यारीजू के प्रीत भरे मान से वे काँचने हो जाती है । कनकता रूपी दर्शन ज्योत्सने चन्द्रिका में तनिक थिर थिर मान मयी चाल से अभिभूत हो रहा है म अर्थात यह भी श्री...

श्रृंगार लालसा , तृषित

श्रृंगार लालसा रँग भरी कुँज ...सभी सखियाँ यहाँ वहाँ खोज रही... ...मिली सखी वह वस्तु ....ना सखी , मौहे न मिली सभी शीघ्र निहारो कहाँ गई ...कहाँ गई ....प्रिया प्राण की रक्षा के लिये उसे शीघ्र तल...

विदग्धे , तृषित

नागरी जू ,सम्पुर्ण प्रीति कलाओं की कोमल मर्मस्थली ...मोहन-विमोहनी (( विदग्धता होती आंतरिक दग्धता । प्रति रोम आंतरिक दाह । कैसा दाह प्रियतम सुख पोषणार्थ जो अभिलाषा अपने प्रा...

भाव-वेदना , तृषित

*भाव-वेदना* भाव स्थिरता होती है , वेदनाओं के पोषण से । घाव की सम्भाल होती है यहाँ , घाव (वेदना) मिट जाता है तब होती है महापीडा । घाव गहन हो नित गहन हो वही स्थिति उतनी ही सरसता से भरी ह...