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सँग न छुटे , तृषित

रसिक रज लगें सो सँग ग्रहण है । किन्हीं किन्हीं को रस की बिन्दु मिलवे पर वह रसिक विमुखी भी हो उठते है , जैसा हमें भी कहा जाता कि रस ने छुआ तो आपने यह सब क्यों छुआ हुआ है ? उत्तर - रसिक...

सखी हियोत्सव झरण

कुँजन को अर्थ है ललित श्रृंगार भरित विपुल वन बिहार हेतु सरस सेवा को रसिक ललितकिशोरी जोरी हेत मोहित सोहित वल्लरियन की रँग खेंचन माहिं लपट-लिपट झूमै झुमावै ऐसो भाव लता कुँज ...

सौहार्द-झरण , तृषित

*सौहार्द-झरण* सेवा-निवेश हेतु क्षमता बहने को उन्मत्त है , परन्तु श्रीलाडिलीलाल कृपा कर उसे अनवरत बहने के लिये उत्सवित रखें ...क्योंकि जब किसी प्याऊँ पर कुछ दिन कोई जल पीने नहीं आता तब या तो वह प्याऊँ हटा दी जाती है अथवा कोई नई व्यापारी तकनीकी खोजी जाती है । किसी भी रसझारी (प्याऊँ) ने अगर वह काल देखा हो जब वह रसार्थ सेवित हो और बिना पिलाये मटकियों का जल सूख रहा हो । फिर कुछ काल मे ही वहां अवशेष ही मटकियों के मिलते हो । बिना किसी पिपासु के पिपासा की सेवा बहे यह कठिन है । क्योंकि पिपासु सँग से ही पिपासा का निदान सेवित हो सकता है ।  रक्तदान दाता को भी रक्त ग्रहण करने वाला चाहिये , ना कि वह याचना करता है कि कोई ले लो मेरा रक्त (जीवन रक्षण के लिये जिस भाँति जाति-प्रजाति - संस्कार आदि ना चिंतन कर रक्त ग्रहण किया जाता हो वैसे ही कोई सहज प्रेम रस का रोगी ही तृषित तुझे तृषात्मक पोषण दे सकेगा)। जबकि भाव सम्पूर्ण चेतन शक्ति के प्राण का गहन द्रवीभूत सार रस है , जो कि केवल अप्राकृत ही जीवन में जीवनमय है । प्राकृत प्रकटीकरण में वह सहज उच्छलित नहीं रहता है ...जिस भाँति कागज पर बना सूर्य प्रकाश आद...

तृषित ललिते , तृषित

जहाँ छलकी है शबे मुलाक़ात दिल में हमने फिर बात अपने छिपे दिल की ही की है जहाँ छलकी है वही छलकी है आँखों में ललिता उतर चली है सुना है तुमने अधूरी नाचती मेरी बातों को तो तृषित धि...

सखी मोरे प्राण मराल , तृषित

सखी मोरे प्राण मराल , चुनि चुनि रसिली शरद रसाल सखी मोरे प्राण युगल , झूमत फुलत उमगावे गुलाल सखी मोरी प्राण निधि , रीति गुढ़ रस रति बसन्त सु पुलाल सखी मोरी तृषित प्यारी , सजाई के ल...

स्थूल पदार्थ से भोग होना , तृषित

*स्थूल पदार्थ से भोग होना* जिस भाँति चक्की (दो पाटों के मध्य)के भीतर अनाज डालने पर वह उनके घर्षण से कठोर ध्वनि करती है और अनाज का चूर्ण हो जाने पर वह कठोर ध्वनि धीरे-धीरे कठोरता ...

सिद्धान्त और निकुँज स्पर्श , तृषित

निकुँज रस अनुभव हेतु सिद्धान्त क्षेत्र पर स्वयं को भी सतर्कता से चलना होगा ।  सरस् मधुर स्थितियां ही प्रकट निकुँज विलास में उत्सवित हो सकती है ।  सरसता मधुरता के निकट होने के प्रयास रह्वे तब वह स्वयं निकट होती है ।  मधुर रस और श्रृंगार रस में ही जीवन का सार सुख मिलने की लोलुप्ति होने पर अन्य से चुभन - कटुता - वैमनस्य आदि मिटने लगेंगे । यह नहीं मिटेंगे तो निकुँज नहीं प्रकट होगा । जो केवल प्रेम दे सकें वही इस मधुता को छूते है । रसिक - सन्त सर्व के प्रति करुण सरस और अपनत्व से भरे होते है कारण यह ही है कि सहज होकर ही सहजता का सहचर हुआ जा सकता है । सेवा के तृषित होना होगा सेवक होने हेतु ।  जब हमारे द्वारा निकुँज रस चर्चा निवेदित हो और सन्मुख स्थिति में सिद्धांत क्षेत्र का अभाव हो तब वह चर्चा सिद्धांत के निकट होने लगती है क्योंकि जैसे बालक अति गर्म रस नहीं पी सकते जबकि अभ्यास से पिया जा सकता है वैसे ही जिनका मधुता-शीतल रस का चिंतन नहीं वह गहन अति गहन मधुता-शीतलता आदि का सँग नहीं कर सकते थोड़ा मिश्रण कर निवेदन करनी होती । जबकि श्रीजी की स्मृति भर से हिय शीतल सुरँग शहद में भी...