*सौहार्द-झरण* सेवा-निवेश हेतु क्षमता बहने को उन्मत्त है , परन्तु श्रीलाडिलीलाल कृपा कर उसे अनवरत बहने के लिये उत्सवित रखें ...क्योंकि जब किसी प्याऊँ पर कुछ दिन कोई जल पीने नहीं आता तब या तो वह प्याऊँ हटा दी जाती है अथवा कोई नई व्यापारी तकनीकी खोजी जाती है । किसी भी रसझारी (प्याऊँ) ने अगर वह काल देखा हो जब वह रसार्थ सेवित हो और बिना पिलाये मटकियों का जल सूख रहा हो । फिर कुछ काल मे ही वहां अवशेष ही मटकियों के मिलते हो । बिना किसी पिपासु के पिपासा की सेवा बहे यह कठिन है । क्योंकि पिपासु सँग से ही पिपासा का निदान सेवित हो सकता है । रक्तदान दाता को भी रक्त ग्रहण करने वाला चाहिये , ना कि वह याचना करता है कि कोई ले लो मेरा रक्त (जीवन रक्षण के लिये जिस भाँति जाति-प्रजाति - संस्कार आदि ना चिंतन कर रक्त ग्रहण किया जाता हो वैसे ही कोई सहज प्रेम रस का रोगी ही तृषित तुझे तृषात्मक पोषण दे सकेगा)। जबकि भाव सम्पूर्ण चेतन शक्ति के प्राण का गहन द्रवीभूत सार रस है , जो कि केवल अप्राकृत ही जीवन में जीवनमय है । प्राकृत प्रकटीकरण में वह सहज उच्छलित नहीं रहता है ...जिस भाँति कागज पर बना सूर्य प्रकाश आद...