असर

बेख़ुदी ही मज़ेदार है होकर उनका जाने है हम
ऐ यादों सिसकियाँ ही वफ़ादार है युं दरवाजे पर ख़ामोश है हम

फ़ुरसत नहीं अब ना जाने कब द़िल्लगी करलें सनम
युं कुछ करते नहीं बेप़नाह बेक़रार है हरद़म हम

नज़द़ीक उसकी ग़लियों के जाना ख़्वाब सजाते है हम
फिर महक जो उनकी आती हाल छिपा लौट आते हम

ना होते जो पिया फ़साना सा मानते ईश्क़ को हम
असर युं हुआ नज़रों का हक़ीक़त बस वहीं फ़साने हो गये हम

"तृषित" उदासी चेहरे की पढ़ ना लें कोई किसी के हो गये है हम
खोये-खोये कहीं छिपे बदहाल-क़ैदी से रहने लगे हम

तालिमें बेकार हुई तरसना नहीं सीखे थे किसी की याद में हम
अश्कों ठहरों हद़ हो गई अब आईनें से क्या कहे हम

नाम था उनका सुना बहुत था जानने लगें तो मानने लगें हम
फिर गई जो नज़रें उन पर लाख रोका ज़माना होश कहाँ पाये हम

ग़मे ज़िन्दग़ी में तारिफ़ यारों की फ़कत मज़ाक़ में ना किये हम
"तृषित" हर पल उनकी याद में क़ल्मों नग़मों के कसीदे बुन रहे अब हम     - सत्यजीत "तृषित"

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