अनवरत निहारते नयन श्यामसुंदर के , मृदुला

जैसै गुड़ की मक्खी होती है न वो बेचारी उसका रस लेने जाती है और उसके नन्हे पैर गुड़ में चिपक जाते हैं फिर वह हिल डुल भी नहीं  पाती   , वैसे ही हमारे प्यारे श्यामसुन्दर के कमल लोचन निज सुख अर्थात श्री राधिका के मुखारविन्द का रसपान करने जाते हैं पर फिर वहां से हट ही नहीं पाते , चिपक ही जाते हैं , हिलना डुलाना भी भूल जाते हैं , पुतलियाँ भी न हिलती , पलक भी न गिरती , । अब एसी छवि का कोइ ध्यान करे तो । अनवरत , अखंड रसपान  श्यामसुन्दर का
लेकिन एक घोर आश्चर्य है कि उनके नेत्रों में देखने से दिखती है उनकी अनन्त प्यास कि अनवरत रसपान हो रहा है फिर भी प्यास घटने की जगह बढ़ रही है । जितना पी रहे हैं उतना ही प्यासे होते जा रहे हैं । प्यास और तृप्ति दोनो एक साथ विद्यमान हैं श्याम के नेत्रों में अद्भुत है ।
और नेत्रों में एक शिशु की सी उत्सुकता और निश्छलता है । किसी सांसारिक शिशु के नेत्रों की उत्सुकता , श्याम के नेत्रों की उत्सुकता और निश्छलता का सीकर भी तो नहीं है ।

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